क्या हम व्यावसायिकरण के विरोधी हैं?

एक प्रसिद्ध कोचिंग संस्थान

आजकल हर दिशा में आई.पी.एल. का बुखार है| बहुतेरे हिन्दुस्तानी इसके अंधे जूनून में पागल हैं और कुछ जबरदस्त विरोधी हैं| विरोधियों की ज्यादातर टिप्पणियाँ इसके बाजारीकरण को लेकर है और वो क्रिकेट के इस नंगे नाच से व्यथित हैं| हालाँकि इस विरोध के पीछे कुछ और भी मुद्दे हैं जैसे सट्टेबाजी और काले धन की मौजूदगी| अगर इन आखिरी दो मुद्दों को हटा दिया जाए तो यह विरोध सिर्फ बाजारीकरण के खिलाफ है| आमिर के स्टार प्लस पर प्रसारित “सत्यमेव जयते” में पिछले सप्ताह चिकित्सा के बढ़ते बाजारीकरण पर चर्चा हुई की किस प्रकार चिकित्सक बीमार व्यक्तियों को डरा कर ठगते हैं| पूरे धारावाहिक में बाजारीकरण का विरोध दिखा और समस्या के समाधान के लिए चिकित्सकों के अन्दर सोये कर्तव्यनिष्ठ इन्सान को जगाने की कोशिश की गयी| हालाँकि कुछ समय मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया को उसके कर्तव्यों की याद दिलाने के लिए भी दिया गया|

अब इसी प्रकार के एक दूसरे मुद्दे पर आते हैं| आजकल सिब्बल बाबू काफी निर्णय ले रहे हैं और उसी कड़ी में आज एक नया निर्णय आया| आई.आई.टी. और अन्य सरकारी इंजीनियरिंग विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए अब एक परीक्षा होगी| हालांकि इस विषय पर भी बहस के अनेक मुद्दे हैं लेकिन एक बिंदु ने ध्यानाकर्षित किया है| अनेक शिक्षाविद और टिप्पणीकार पिछले दिनों हुए कोचिंग के विस्तार को रोकने के लिए इस कदम को सही बता रहे हैं| विरोध का कारण वही की शिक्षा का बाजारीकरण हो गया है और ये व्याख्या देख कर यही लगता है जैसे कोचिंग संस्थान चलाना एक दोयम दर्जे का कार्य है|

देश ने वर्ण व्यवस्था के बुरे दौर देखे हैं और उसी की एक कड़ी बनियों ने आम व्यक्ति को भूतकाल में काफी लूटा है| इसलिए व्यवसाय के प्रति यह हीन दृष्टिकोण कोई नयी उत्पत्ति नहीं है| इसी दृष्टिकोण के कारण हम शायद व्यवसायों को हीनता के तराजू में तोलते रहते हैं और जो भी व्यवसाय वैचारिक कसौटी पर खरा नहीं उतरता उसे हीनता का दर्जा दे देते हैं| इतिहास में इसी कारण चमार और जुलाहों को समाज में उचित स्थान नहीं मिला| लेकिन आज भी किसी नए बाजार को देखकर शरीर में सिरहन सी पैदा हो जाती है| इसलिए आज कोचिंग के व्यवसाय और शिक्षा के बाजारीकरण पर टिप्पणी करूँगा|

आज समाज में हर व्यक्ति पैसे के पीछे भाग रहा है और ऐसे समय में ये अपेक्षा करना की शिक्षक भूखा-प्यासा रहकर ज्ञान बांटेगा एक निरर्थक सोच है| एक ऐसे समाज में जहाँ आजकल आर्थिक सुदृढ़ता पर सर्वाधिक ध्यान रहता है, अच्छे व्यक्तियों को शिक्षा की तरफ आकर्षित करने के लिए इस छेत्र में भी रोजगार के अवसर अन्य छेत्रों की टक्कर के होने चाहिए अन्यथा गुणवत्ता को भूल जाना ही बेहतर होगा| अब बात करते हैं कोचिंग संस्थानों की| इसमें कुछ बातें गौर करने लायक हैं| पहली, यह एक बाजार है और किसी भी बाजार की तरह मांग और आपूर्ति के नियम पर ही चलता है| इन संस्थानों को हीन दृष्टि से देखना मांग पर सवाल खड़े करना है| दूसरी, किसी भी बाजार की तरह इसमें शामिल होना न होना इन्सान की जरुरत और संसाधनों पर निर्भर करता है| तीसरी, इस बाजार में प्रतिस्पर्धा है| हर शहर में अनेकों कोचिंग संस्थान होते हैं और आपस में फीस और गुणवत्ता के आधार पर मारा-मारी करते हैं| इस लिहाज से यह एक प्रभावशाली बाजार माना जा सकता है| चौथी, लोगों को कभी-२ इन संस्थानों पर महंगे होने का आरोप लगाते हैं| अगर सिर्फ आई.आई.टी. की तैयारी कराने वाले संस्थानों की बात करें तो इनमें पढ़ाने वाले ज्यादातर शिक्षक स्वयं आई.आई.टी. या अन्य जगहों से उत्तीर्ण होते हैं इसलिए इस रोजगार को अपनाने के लिए उन्हें अन्य उपलब्ध रोजगारों जितना वेतन तो मिलना ही चाहिए| अन्यथा इस रोजगार को चुनने के लिए आर्थिक हानि उठाने वाले लोग कम ही मिलेंगे|

इसलिए आपूर्ति यानि इन संस्थानों को कोसने से बेहतर है की हम मांग के कारणों पर नज़र डालें| अगर हमारे विद्यालयों में सही पाठ्यक्रम और शिक्षण हो तो इनकी दुकान स्वयं बंद हो जाएगी| लेकिन जब तक यह लक्ष्य हासिल नहीं हो पाता तब तक तो ये संस्थान समाज की एक अहम् जरुरत को पूरा करते रहेंगे| और इस आवश्यकता को पूरा करने वाले लोगों और व्यवसाय की ओर हीनता का दृष्टिकोण रखना कितना सही है, इसका उत्तर हमे स्वयं देना होगा| बाजार जीवन को बेहतर और सुगम बनाने का एक प्रभावशाली ढंग है इसलिए व्यावसायिकरण के अनावश्यक विरोध से बचना चाहिए|

गौमाँस पर प्रतिबन्ध

मेरा नंबर कब आएगा?

अभी कुछ दिन पहले कुछ लोगों से इस विषय पर बातचीत हुई की हिंदुस्तान जैसे धर्म-निरपेक्ष देश में गौमाँस पर प्रतिबन्ध किस प्रकार न्यायसंगत है? बहुत लोगों के हिसाब से तो यह सीधे-२ स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है| क्योंकि आस्था किसी भी छोटी सी बात से आहत हो सकती है, इसलिए आस्था का नाम लेकर तो न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता| क्योंकि देश के अनेक राज्यों में पहले से ही यह प्रतिबन्ध लगा हुआ है इसलिए मैंने खोपड़ी लगायी की क्या किसी रूप अन्य रूप में इसको वैध घोषित किया जा सकता है|

भारत में पशुपालन के लिए बड़े-२ पशु-फार्म नहीं होते वरन छोटे एवं मध्य वर्ग के किसान अपने घर के आँगन या पिछवाड़े में १-२ पशु पालते हैं| ज्यादातर परिवारों के लिए पशुधन से प्राप्त दूध, घी पोषण का काम करता है और कुछ के लिए आय बढ़ाने में भी सहयोग करता है| इसी प्रकार गोबर इत्यादि ईंधन का कार्य करते हैं| तो कुल-मिलकर देखा जाए तो पशुधन भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए रीढ़ की हड्डी है| तो अब गौमाँस पर प्रतिबन्ध को इस परिपेक्ष्य में देखते हैं| अगर प्रतिबन्ध हटा लिया जाता है तो बाजार में मांस की मांग बढ़ जायेगी और क्योंकि विदेशों के मुकाबले भारत में गाय का मांस सस्ता होगा इसलिए निर्यात में भी जबरदस्त उछाल आएगा| इन दोनों कारणों से गाय की कीमतों में भी तेजी से उछाल आएगा और छोटे स्तर पर १-२ पशु पालना मुश्किल ही नहीं असम्भव हो जाएगा क्योंकि बीमारी या किसी और कारण से मृत्यु के बाद नया पशु खरीदना हाथ से बाहर हो जाएगा|

अगर इस दृष्टि से देखें तो प्रतिबन्ध को अन्य सरकारी योजनओं जैसे म.न.रे.गा. इत्यादि के सन्दर्भ में भी देखा जा सकता है| क्योंकि भैसों के कटान पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है इसलिए पिछले कुछ वर्षों में भैंस की कीमतों में अत्यधिक बढ़ोतरी दर्ज की गयी है| हालांकि मैं इस विषय में सरकारी आंकड़े नहीं जुटा पाया परन्तु मेरे अनुभव के हिसाब से पिछले ५ वर्षों में कम से कम १००-१५०% का उछाल तो आया ही है, दूध की कीमतें भी इसी दिशा में संकेत करती हैं| गौर करने की बात ये है की इन  मृत भैंसों का ज्यादातर निर्यात खाड़ी के देशों में किया जाता है क्योंकि देश में अभी भी इनके माँस की अधिक माँग नहीं है| क्योंकि यह विषय ग्रामीण अर्थव्यवस्था से सीधे-२ जुड़ा हुआ है, इसलिए इस मूल्य वृद्धि से गाँव में पशुपालन पर क्या असर हुआ है एक अच्छे अनुसन्धान का विषय है| इसके बाद बच्चों में कुपोषण पर इसका क्या प्रभाव हुआ है यह भी जांच का विषय हो सकता है| दूध-घी छोड़कर लोगों ने क्या खाना शुरू किया है और क्या नए भोजन से आवश्यक पोषण प्राप्त किया जा सकता है? अगर भैंसों की कटान से गरीब लोगों के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है तो भैंसों के कटान पर भी प्रतिबन्ध लगाने के बारे में भी सोचा जा सकता है| लेकिन किसी भी नतीजे पर पहुँचने से पहले अनुसन्धान की आवश्यकता है हालांकि मेरे अनुभव के हिसाब से काफी नुकसान हो चुका है और गांवों में पशुपालन के स्तर में गिरावट आई है|

नकल के दीवाने-२

सब जगह नकल

पिछले लेख में नकल के विषय में कुछ टिप्पणियाँ की थी| हालांकि इस स्थिति के पीछे काफी सारे सामाजिक कारण हैं और कहीं न कहीं यह आचरण शिक्षा व्यवस्था के प्रति हमारे दृष्टिकोण को भी उजागर करता है| नीचे कुछ बिन्दुओं को रेखांकित करना चाहूँगा(इस चर्चा के दौरान में सिर्फ सुनियोजित नकल के विषय में बात कर रहा हूँ, जो सामान्यतः अभिभावकों की सहमती से की जाती है)-

१. अत्यधिक संतान मोह और उसे असफलता से बचाने के बचपन से प्रयत्न
२. १०-१२वी स्तर तक अत्यधिक सामाजिक प्रतिस्पर्धा| मध्यम-वर्ग में बच्चे के प्रदर्शन से नाक की लड़ाई लड़ी जाती है| काफी अभिभावक इस सोच के कारण भी नकल का रास्ता पकड़ते हैं|
३. नौकरियों/पढाई के सीमित अवसर
४. नकल करते हुए पकड़े जाने पर अधिकारिक तौर पर ढुलमुल कार्यवाही

१,२,३ के कारण जहाँ समाज में नकल करने से लाभ में बढ़ोतरी होती है, वहीँ ४ के कारण नुकसान में गिरावट आती है| अगर नकल करते समय पकड़े जाने की स्थिति में अत्यधिक कठोर कार्यवाही की जाए तो नकल करने वाला व्यक्ति तुलनात्मक गणना करके नकल में लिप्त नहीं होगा| उधाहरण के लिए- अगर पकड़े जाने की सम्भावना ५०% है और कार्यवाही की सम्भावना १०% तो बस १०० में से ५ लोगों को दंड मिलेगा, वहीँ अगर कार्यवाही सभी १००% मामलों में की जाए तो १०० में से ५० लोगों को दंड मिलेगा| अब बात करते हैं दंड की- अगर दंड की तीव्रता बाधा दी जाए(जैसे ५ सालों के लिए प्रतिबन्ध) तो अभिभावक और छात्र जब नकल का नफा-नुकसान देखेंगे तो नकल के विरोध में ही निर्णय लेंगे| इसलिए मेरे विचार से अभी हमारे समाज में नकल करने वाले पकड़े जाने के स्थिति में भारी नुकसान नहीं उठाते, इसलिए सुनियोजित ढंग से नकल का प्रयोग करते हैं|

एक-दो बातें और गौर करने लायक हैं| अंग्रेजी में कहते हैं(Supply creates its own demand) अर्थात आपूर्ति स्वयमेव मांग विकसित कर लेती है| शुरुआत में अध्यापकों ने देश में नकल कराने का उद्योग विकसित किया- पहले अपनी संतानों के लिए और फिर व्यापक स्तर पर| इससे नकल खरीदने वाले पैदा हुए और अन्य लोग इस व्यवसाय में कूदे| नकल कराने, फर्जी मार्कशीट बनाने से लेकर दाखिले कराने तक के लिए अनेकों लोग इस उद्योग में कार्यरत हैं| इसमें अनेक ऐसे छात्र जो अपने घर में पहली पीढ़ी के पढने वाले हैं या जिनके अभिभावकों ने उच्च शिक्षा हासिल नहीं की है, इस कच्चे लालच के शिकार हो जाते हैं| दूसरा ऐसी स्थितियों के कारण समाज को नकल की आदत पद जाती है| जिन्होंने एक बार नकल कर ली, वो भविष्य में भी नकल के भरोसे बैठ जाते हैं| और जो शिक्षा व्यवस्था में नया कदम रख रहे हैं, वो यह देख कर की नकल आराम से हो जाती है कोई और विकल्प( जैसे मेहनत करना) तलाश ही नहीं करते|

इस लेख में मैंने काफी सारे मनोवैज्ञानिक व सामाजिक कारणों को अनदेखा किया है जो हमारी शिक्षा व्यवस्था के प्रति सोच पर प्रकाश डालने में सहायक हो सकते हैं| बहुत से छात्र अभिभावकों के सहयोग के अभाव में भी नकल का रास्ता चुनते हैं| इसका उत्तर ढूँढने के लिए संभवतः शिक्षा के स्वरुप और जीवन में उसके उपयोग पर एक व्यापक बहस की आवश्यकता है| अब बहुत से विद्यालयों में अध्यापक पढ़ाते ही नहीं, तो छात्र सीखेंगे कहाँ से| सरकारी नौकरी द्वारा प्रदत्त बंधे हुए वेतन के कारण अध्यापकों के पास पढ़ाने के लिए उचित incentive ही नहीं होते| कमी ढकने के लिए छात्रों को नकल करने देना आसान प्रतीत होता है| इसलिए नकल पर कठोर कार्यवाही करने की राह भी कम मुश्किल नहीं है| इसलिए सरकार पर पढाई का बोझ डालने के विषय में भी गंभीर निर्णय करने की जरुरत है| इस प्रकार के अनेक अन्य मुद्दों पर भी बहस हो सकती है|

लेकिन सारांश में यही कहूँगा- नकल पर नकेल कसनी है तो पकड़े जाने की स्थिति में होने वाले घाटे को बढ़ा दो( तभी अध्यापकों पर पढ़ाने का दबाव भी बढ़ सकता है)| और अवसर बढ़ा कर प्रतिस्पर्धा में थोड़ी कमी कर दो(१-१ अंक की मारामारी में न जाने कितने बर्बाद हुए)|

नकल के दीवाने

हिंदुस्तान में कहीं भी जाओ, लेकिन हिन्दुस्तानियों का नकल में विश्वास अटल प्रतीत होता है| हालांकि ऐसा सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं होता, चीन में हर प्रकार के सामान की नकल की जाती है| लेकिन मैं जिस नकल की बात कर रहा हूँ वो है परीक्षाओं में नकल| हिन्दुस्तानी न सिर्फ परीक्षाओं में नकल करते हैं वरन अनेक व्यक्ति तो डाक्टरेट में भी नकल कर पास होने का प्रयत्न करते हैं| यह शायद स्वयं की सोच और समझ पर प्रश्नचिंह लगाने वाली परिस्तिथि का परिसूचक है| लेकिन यह विचार मेरे दिमाग में कैसे आया, इसका पीछे भी एक कारण है| अभी हाल फिलहाल एक हरियाणवी फिल्म देखी जिसमें यह यथार्थ वापस उभरकर सामने आया है-

असर

 

और अनेक परिस्थितियों में तो अभिभावक भी इस कुकृत्य में परीक्षार्थियों की सहायता करते हुए देखे जा सकते हैं| संभवतः वह इस सहायता का लम्बे दौर में नुक्सान का आकलन करने में असमर्थ होते हैं इसलिए इस दूरदर्शिता के अभाव में बह जाते हैं|

Copying में प्रकाशित किया गया | 1 Reply

अब उच्च शिक्षा के बाद डॉक्टरों को अमेरिका से वापस आना पड़ेगा

सरकार की एक नयी योजना| अब अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए जाने वाले चिकित्सकों को जाने से पहले लिखित अनुबंध करना होगा जिसके अनुसार वह अमेरिका में काम नहीं कर सकेंगे| ऐसे चिकित्सकों को फिर ग्रामीण इलाकों में जाकर काम करने के लिए कहा जायेगा| हालाँकि ज्यादातर चिकित्सक हमारे कर के पैसों से अपनी पढाई पूरी करते हैं, लेकिन क्या यह कारण उनके व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप के लिए काफी है? कुछ दूसरे लोग दलील देते हैं की इस कदम से ग्रामीण इलाकों की चिकित्सा सुविधाओं में सुधार होगा|
लेकिन मेरे हिसाब से यह कदम किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता और इस कदम से वांछित परिणाम भी नहीं हासिल किये जा सकते| मेरी इस विषय में निम्नलिखित टिप्पणियाँ हैं:

 
– यह फैसला आज़ादी के अधिकार की खुली अवमानना है और व्यक्तिगत जिंदगी में हस्तक्षेप है| हालांकि अभी भी सरकारी अस्पतालों के छात्रों को कुछ साल गाँवों में आवश्यक नौकरी करनी पड़ती है, लेकिन यह कदम भी सरासर अलोकतांत्रिक है| चिकित्सकों को भी निजी निर्णय लेने का संपूर्ण अधिकार होना चाहिए| अधूरे मन से क्या कोई चिकित्सक अपने कार्य को प्रभावशाली ढंग से कर पायेगा? अगर सरकारी पैसों से पढाई की भी है, तो भी छात्रों को पैसा वापस देने और गाँव में काम करने के विकल्पों में से एक को चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए| कल को यह प्रतिबन्ध नर्स और अन्य कर्मियों पर भी लग सकता है की आप अपनी तहसील से बाहर नहीं जा सकते|

 
– देश में हर साल लगभग ४०,००० छात्र एम्.बी.बी.एस. में दाखिला लेते हैं| देश में हर १००० व्यक्तियों पर ०.६ चिकित्सक मौजूद हैं, जबकि किसी भी विकसित देश में यह संख्या आमतौर पर ४-५ होती है| आर्थिक प्रगति के बावजूद इस मोर्चे पर हम बुरी तरह पिछड़े हुए हैं और दुःख का विषय यह है की इस मोर्चे पर प्रगति की गति न के बराबर है| पिछले १० सालों में भी इस संख्या में कोई बढ़ावा नहीं हुआ है| कारण, चिकित्सा से सम्बंधित उच्च शिक्षा में निजी संस्थानों का देश में कोई स्थान ही नहीं है| जहाँ इंजीनियरिंग के हजारों संस्थान है, वहीँ मेडिकल में इक्का-दुक्का| यह चिकित्सा में सरकार के अत्यधिक प्रबंधन का ही नतीजा है| इसलिए, चिकित्सा के छेत्र में निजी निवेश को प्रोत्साहन देने के बजाये, सरकार अभी भी छोटी-मोटी तरकीब ही लगा रही है| बिना निजी निवेश के चिकित्सा व्यवस्था में बदलाव लाना असंभव है, जल्दी चाहिए तो कम से कम शिक्षा में विदेशी निवेश को बढ़ावा देना ही पड़ेगा| कुछ १०००-२००० चिकित्सकों को रोक लेने से चरमराई व्यवस्था किसी भी प्रकार से उठ कर खड़ी नहीं हो जायेगी| चिकित्सा में मात्र १६००० परास्नातक स्थान हैं, जो की स्नातकों की संख्या के हिसाब से कम ही हैं| इसलिए यह पूरी समस्या आपूर्ति से सम्बंधित है न की चिकित्सकों के स्वभाव के कारण| और सरकार गलत बीमारी का इलाज करने में लगी है|

 
– चिकित्सा छेत्र में ऐसे बहुत से विषय हैं जिनपर देश में कोई अनुसन्धान ही नहीं होता| ऐसी हालत में विदेश से शिक्षा पाकर लौटे छात्र के पास तो कोई विकल्प ही नहीं रह जायेगा|

 
– भविष्य में यही प्रतिबन्ध अन्य व्यवसायों और शिक्षा ग्रहण करने वालों पर भी लग सकते हैं| प्रतिभा पलायन से हमेशा नुकसान ही नहीं होता| ७०-८० के दशक में जिन लोगों ने देश में कम अवसरों के कारण पलायन किया था आज वही देश में बड़े निवेश के पीछे भी हैं| अगर उस समय ये लोग यहीं रुक गए होते, तो किसी भी प्रकार से सीमित अवसर वाले इस देश में उस समय कोई तीर नहीं मार पाते और आज भी कोई योगदान न दे पाते|

अम्बेडकर बनाम गाँधी: व्यावहारिकता बनाम आदर्शवाद

भारत-पाकिस्तान विभाजन भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है| इसी कड़ी के अलग-२ पहलु समझने के लिए हाल-फिलहाल एक अम्बेडकर द्वारा लिखी गयी किताब पढ़ी-“The Partition of India”|

Map of British India with areas showing hindu-muslim population concentration

एक ऐसे समय में जब हिन्दू और मुस्लिम संस्थायें धार्मिक उन्माद में खोये थे और कांग्रेस हमेशा की तरह कोई भी फैसला लेने में असमर्थ थी- ऐसे समय में अम्बेडकर एकमात्र व्यावहारिकता की किरण थे| मुस्लिम लीग के अलावा उस समय के बुद्धिजीवियों में अम्बेडकर उन चुनिन्दा इंसानों में से थे जिन्होंने विभाजन का व्यावहारिकता की दृष्टि से समर्थन किया था| उपर्लिखित किताब में अम्बेडकर ने विभाजन का विरोध करने वालों और हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द का सपना देखने वालों को तर्क देकर यथार्थ दिखाने का प्रयत्न किया है|

भारत विभाजन का विरोध करने वालों में कांग्रेस और गाँधी सबसे मुखर थे| बंटवारे के मुद्दे पर गाँधी ने व्यावारिक रूप से सोचने के बजाये स्वयं एवं देश को आदर्शवाद के भ्रम में अंत तक उलझाए रखा| विभाजन के विरोध में गाँधी की पहली दलील यह थी की वह इस पाप में भागीदार नहीं हो सकते| किसी स्थिति का विरोध करने के लिए ये तर्क सिर्फ हिंदुस्तान में ही चल सकता था(चल सकता है!)| गाँधी ने कांग्रेस की कमान सँभालते ही सबसे पहले हिन्दू-मुस्लिम एकता को प्राथमिकता दी थी, परन्तु इस पहल के बावजूद देश में लगातार साम्प्रदायिकता की आग बढ़ती रही| अनेको कोशिशों के बावजूद वह इस खाई को पाटने में नाकाम रहे| इसलिए जब ऊपर वाला तर्क भी इस आग को शांत करने में नाकाम रहा तब उन्होंने मुस्लिम लीग की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिंह लगा दिया| इस प्रकार उन्होंने एक दूसरी कल्पना में आश्रय लिया जहाँ उन्होंने मुस्लिम लीग और जिन्ना को मुस्लिमों का प्रतिनिधि मानने से ही इनकार कर दिया| इस प्रकार गाँधी और कांग्रेस स्वयं को अन्धकार में रख कर आखिरी समय तक अल्पसंख्यकों के सवाल से आँखें चुराते रहे, वहीं अम्बेडकर अपने विचारों के कारण दोनों समुदायों के निशाने पर आते रहे|

इस किताब में अम्बेडकर ने एक-२ कर विभाजन की परिस्थिति में दोनों समुदायों के फायदे का आंकलन किया है| १९२० से बाद के घटनाक्रम और हिन्दू-मुस्लिम एकता की अनेको कोशिशों की विफलता को देखकर ही अम्बेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे की आजाद हिंदुस्तान में सांप्रदायिक सौहार्द की कल्पना करना एक मृगतृष्णा है| इसलिए भविष्य की परेशानियों और संभवतः गृहयुद्ध की संभानाओं को ध्यान में रखते हुए ही अम्बेडकर ने विभाजन का पक्ष लिया था| इसके अलावा अम्बेडकर ने दूसरे लोगों द्वारा सुझाये गए विभाजन के अन्य विकल्पों पर भी विस्तृत चर्चा की है| साथ ही साथ कुछ अन्य देशों जैसे तुर्की, चेकोस्लोवाकिया के उदाहरण लेकर भी इस समस्या पर प्रकाश डालने की कोशिश की है| कुल मिलाकर इस मामले में मैं अम्बेडकर के ज्यादातर तर्कों से सहमत हूँ क्योंकि धार्मिक पहचान की इस जटिल समस्या में विभाजन ही एकमात्र और सबसे कम रक्तरंजित उपाय था| ये अलग बात है की शुरू की सुस्ती के कारण अंत में विभाजन की जो हड़बड़ी मची उससे इतिहास रक्तरंजित हो गया| अगर कांग्रेस विभाजन के यथार्थ को समय रहते समझ लेती तो  संभवतः अंग्रेजी शासन बंटवारे के दौरान क़ानूनी व्यवस्था संभाल पाता और देश को अराजकता का भयावह रूप न देखना पड़ता|

तर्क देने के अलावा अम्बेडकर ने विभाजन की योजना पर भी विचार प्रस्तुत किये थे| विभाजन की परिस्थिति में सीमारेखा निर्धारण से लेकर जनमत संग्रह कराने तक के सुझाव अम्बेडकर द्वारा दिए गए थे| इस लेख में दिए गए मानचित्र भी अम्बेडकर द्वारा ही बनाये गए हैं जो की वर्तमान की पंजाब और बंगाल की सीमारेखाओं से काफी मिलते जुलते हैं|

Population distribution of Punjab before independence

Population distribution of Bengal before independence

अम्बेडकर की व्यवहारिक सोच के कारण ही देश को एक सबल संविधान मिल पाया है| मेरा मानना है  इस महान नेता और चिन्तक को सिर्फ दलित उद्धारक के रूप में देखना, उसके अन्य योगदानों को भुलाने सरीखा  है| इसलिए इतिहास की किताबों में व्यावहारिक अम्बेडकर के योगदानों को भी अन्य आदर्शवादियों की तरह यथोचित स्थान देना अति-आवश्यक है, अन्यथा आज़ादी का इतिहास अधूरा रह जायेगा|

विभाजन के विषय में और पढने के लिए यहाँ क्लिक करें|

Another article with flawed economic reasoning

I came across one of the articles published in Business Line by an associate editor and it again points to the flawed economic reasoning employed and promoted in the Indian media. Here’s the link: Business line

Here goes the text from the article:

People prefer to be seen differently from how they actually are. This presents a fantastic business opportunity.

That is why, as the above article shows, FMCG stocks, consisting about a third of cosmetics producing firms, have been doing so well. The BSE FMCG index, which tracks top FMCG companies, has moved up 50 per cent. In contrast, the Sensex has gained only 3 per cent over the last two years. Listed FMCG companies have even raised product prices without hurting demand.

And production numbers support this trend. The consumer non-durable segment of the IIP grew by 15 per cent between February 2010 and 2012 while the IIP as a whole grew only by 11 per cent. This phenomenon — of ever-increasing FMCG products in India — presents not only a business opportunity. It also shows (once again) how India is the graveyard of many economic theories.

THE OLDER GRAVES

My favourite grave is the theory of monopoly, which holds that monopolists restrict output to increase prices and profits. The Indian Railways has been doing the exact opposite for the last 40 years: It has lowered prices and expanded output despite being a monopoly.

Another favourite grave on which I regularly place flowers is the theory underlying the fiscal deficit. Someone at the IMF thought up the ‘ideal’ level of deficit: 3 per cent.

Violate it, economists growled and fire and brimstone will rain down from the heavens on your country. They did and do — but not in India which not only merrily violates the ‘rule’ but also grows cheerfully at almost 8 per cent.

A third, and more recent, grave is the vulgarised version of the Taylor Rule which says that in an open economy, the central bank can either control interest rates or exchange rates but not both.

But along comes India and kills the rule. Consider: If interest rates are high, the dollars ought to flood in and the rupee should appreciate. In India, it works the other way round.

No wonder the colonial Victorian priests thought we were devious, shifty, unreliable and, on the whole, not to be trusted.

AND THE NEW ONE…

Now the theory of elasticity has been beheaded in India. This theory says that the demand for inessentials is highly responsive to changes in price, whence elastic/elasticity. The reverse is also true in that the demand for essentials is not.

But as the case of FMCGs in the lead article on this page shows, India has quietly laid this theory to rest. The sales of the most of the inessential things ever, namely, appearance-care products, are growing at a very healthy clip.

This is happening in spite of their prices increasing, both in nominal and real terms — the latter because incomes are not growing at the same rate. The theory of elasticity of demand would have it the other way round.

Where shampoos are concerned, it seems the killer weapon is the sachet. There is no inventory cost and this helps with the family cash flow.

But creams don’t seem to come in sachets and cost the earth. Yet women are as addicted to them are as men are to cigarettes.

Economic theory also says that there should be a shift to inferior substitutes when prices go up. But that’s not happening, either. Instead, inferior substitutes are simply raising their prices and see their revenues soar as demand also soars. Point made.

Here goes my arguments to correct the author:

1. Railway is a public monopoly and inefficient. The economists differentiate between public and private monopolies and hence they have no confusion about the Railways. Public monopolies usually turn inefficient because of excessive political manoeuvrings and railways is no different story. Railways can reduce prices and expand output because it can draw on the exchequer in case of need, the way Air India does right now.

2. The presence of high fiscal deficit and high growth rate are no miracle. Its because of a 7-8% growth rate that India can support around 5% fiscal deficit. Its a simple case of no-ponzi scheme where high growth prevents the high govt. expenditure and borrowing turn into a ponzi scheme. It is the reason why IMF frowns upon low growth economies indulging into high deficits because in the real world there is no space for Ponzi schemes.

3. On the Taylor rule, it was again high growth which helped maintain the balance between interest rate and exchange rate and nothing to do with central bank’s planning. Right now the downward trajectory of growth rate has thrown the bank in a policy dilemma and recent volatility in the exchange rate points to this factor and constraints on the central bank. Although, the Taylor rule has its own limitation but not the one presented in the article.

4. On the demand elasticity issue, the author calls FMCG goods as inessentials but the point is that these goods are no longer a luxury but essential goods for the Indians. So, am not surprised with the demand inelasticity shown by beauty-care products( or the essential goods). So, we need to check our definitions of essentials and inessentials before reaching any conclusion.